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काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं गीत नया गाता हूं


सुनहरी सुबह के साथ..एक नया दिन..एक नया साल...एक नई शुरुआत..साल 2018 का इस्तकबाल..कुछ इसी अंदाज में करने के लिए हर कोई तैयार है। नये साल पर पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की कविताएं हर किसी में नये उत्साह के संचार के लिए काफी है...
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

31 December, 2017
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